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कौषीतकिब्राह्मण • अध्याय 2 • श्लोक 15
अथातः पितापुत्रीयं संप्रदानमिति चाचक्षते । पिता पुत्रं प्रेष्यन्नाह्वयति नवैस्तृणैरगार संस्तीर्याग्निमुपसमाधायोदकुम्भं सपात्रमुपनिधायाहतेन वाससा संप्रच्छन्नः स्वयं श्येत एत्य पुत्र उपरिष्टादभिनिपद्यते, इन्द्रियैरस्येन्द्रियाणि संस्पृश्यापि वाऽस्याभिमुखत एवासीताथास्मै संप्रयच्छति वाचं मे त्वयि दधानीति पिता वाचं ते मयि दध इति पुत्रः प्राणं मे त्वयि दधानीति पिता प्राणं ते मयि दध इति पुत्रः । चक्षुर्मे त्वयि दधानीति पिता चक्षुस्ते मयि दद्य इति पुत्रः । श्रोत्रं मे त्वयि दधानीति पिता श्रोत्रं ते मयि दध इति पुत्रः । मनो मे त्वयि दधानीति पिता मनस्ते मयि दध इति पुत्रः । अन्नरसान्मे त्वयि दधानीति पिता अन्नरसांस्ते मयि दध इति पुत्रः । कर्माणि मे त्वयि दधानीति पिता कर्माणि ते मयि दध इति पुत्रः । सुखदुःखे मे त्वयि दधानीति पिता सुखदुःखे ते मयि दध इति पुत्रः। आनन्दं रतिं प्रजातिं मे त्वयि दधानीति पिता, आनन्दं रतिं प्रजातिं ते मयि दध इति पुत्रः । इत्या मे त्वयि दधानीति पिता, इत्यास्ते मयि दध इति पुत्रः । धियो विज्ञातव्यं कामान्मे त्वयि दधानीति पिता धियो विज्ञातव्यं कामांस्ते मयि दध इति पुत्रः । अथ दक्षिणावुत्प्राडुयनिष्क्रामति तं पिताऽनुमन्त्रयते यशो ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यं कीर्तिस्त्वा जुषतामित्यथेतरः सव्यमंसमन्ववेक्षते पाणिनाऽन्तर्धाय वसनान्तेन वा प्रच्छाद्य स्वगाँल्लोकान्कामानाप्नुहीति स यद्यगदः स्यात्पुत्रस्यैश्वर्ये पिता वसेत्परि वा व्रजेद्यद्यु वै प्रेयाद्यदेवैनं समापयति तथा समापयितव्यो भवति तथा समापयितव्यो भवति ॥
(प्राणोपासक का सम्प्रदान-कर्म) अब पिता-पुत्र के सम्प्रदान कर्म का वर्णन करते हैं। जब पिता यह निश्चय करे कि मुझे अब इस शरीर का परित्याग करना है, तब वह अपने पुत्र को पास में बुलाए। तत्पश्चात् कुश-कासादि तृणों से यज्ञशाला को ढक करके विधि-विधान से अग्नि को स्थापित करे। अग्रि के उत्तर या पूर्व दिशा में जल से भरा हुआ कलश प्रतिष्ठित करे। कलश के ऊपर धान्य से भरा हुआ पूर्ण-पात्र भी रखे। स्वयं भी नवीन वस्त्र (धोती एवं उत्तरीय) का आच्छादन करे। इस तरह चेत शुभ्र वस्त्र एवं माला आदि धारण करते हुए घर में प्रवेश करके पुत्र को अपने पास बुलाये। जब पुत्र पास में आ जाए, तो उसे अपने अङ्क में भर ले एवं अपनी इन्द्रियों से पुत्र की इन्द्रियों का स्पर्श करे। या फिर केवल पुत्र के समक्ष बैठ जाए और उसे अपनी वाक् आदि समस्त इन्द्रियों का दान करे। पिता कहे - हे पुत्र! मैं तुम में अपनी वाक् शक्ति की स्थापना करता हूँ। पुत्र कहे - पिताजी में आपकी वागिन्द्रिय को ग्रहण करता हूँ। पिता - हे पुत्र! मैं अपने प्राण को तुममें स्थित करता हूँ। पुत्र - मैं आपके प्राणतत्त्व को अपने में धारण करता हूँ। पिता - हे पुत्र। मैं अपनी नेत्रेन्द्रिय को तुममें स्थापना करता हूँ। पुत्र - मैं आपके नेत्रेन्द्रिय को अपने में धारण करता हूँ। पिता - मैं अपनी श्रोत्रेन्द्रिय को तुममें स्थापना करता हूँ। पुत्र - मैं आपकी श्रोत्रेन्द्रिय को अपने में धारण करता हूँ। पिता - मैं अपने अन्न-रसों को तुममें स्थिर करता हूँ। पुत्र - मैं आपके अन्न रसों को अपने में धारण करता हूँ। पिता - मैं अपने सभी श्रेष्ठ कर्मों को तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र - मैं आपके समस्त शुभ कर्मों को अपने में धारण करता हूँ। पिता - मैं अपने सुख एवं दुःख को भी तुममें प्रतिष्ठित करता हूँ। पुत्र - मैं आपके सभी तरह के सुख एवं दुःखों को स्वीकार करता हूँ। पिता - हे पुत्र। मैं तुममें मैथुन जनित आनन्द, रति एवं सन्तान की उत्पत्ति को शक्ति स्थापित करता हूँ। पुत्र - मैं आपकी उस शक्ति को अपने में धारण करता हूँ। पिता - हे पुत्र! मैं अपनी गतिशक्ति तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र - मैं आपकी गतिक्ति को स्वयं में ग्रहण करता हूँ। पिता - मैं अपनी बुद्धि-वृतियों को, बुद्धि द्वारा ज्ञात विषयों को एवं विशेष इच्छाओं को तुममें स्थित करता हूँ। पुत्र - मैं आपकी बुद्धि वृत्तियों को, बुद्धि के द्वारा ज्ञात विषयों को एवं इच्छाओं को धारण करता हूँ। तत्पश्चात् पुत्र पिता की प्रदक्षिणा करते हुए प्राची दिशा की तरफ पिता के पास से निकलता है। उस समय पिता पुत्र को सम्बोधित करते हुए कहे - 'यश, ब्राह्मतेज, अन को ग्रहण करने एवं पचाने की सामर्थ्य तथा श्रेष्ठ-कीर्ति ये सभी सद्‌गुण तुम्हारा सेवन करें।' पिता के इस तरह कहने पर पुत्र अपने बायें कन्धे की तरफ नजर घुमाकर देखते हुए हाथ से ओट-करके या फिर कपड़े को सामने करके उसकी आड़ से पिता से इस प्रकार कहे - 'आप अपनी इच्छानुसार कामनायुक्त स्वर्ग को एवं वहाँ के समस्त भोगों की प्राप्ति करें।' इसके अनन्तर यदि पिता नीरोग हो, तो वह पुत्र को घर का स्वामी मानकर उसके साथ निवास करे या सर्वस्व त्यागकर घर से बाहर निकलकर संन्यासी हो जाए या फिर यदि वह दूसरे लोक को चला जाये, तो जिन-जिन वाणी आदि इन्द्रियों को उसने पुत्र में प्रतिष्ठित किया था, उन सभी की शक्ति धाराओं का वह अधिकारी बन जाता है। वे सम्पूर्ण शक्ति-धाराएँ उसे प्राप्त हो जाती हैं। (यही वास्तव में सही उत्तराधिकार है।)
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