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अध्याय 7 — सप्तमः खण्डः

जाबाल दर्शन
13 श्लोक • केवल अनुवाद
हे महामुने! अब मैं प्रत्याहार का वर्णन करता हूँ। विषय-भोगों में स्वभाववश विचरण करने वालो समस्त इन्द्रियों को बलात् वहाँ से वापस लाने का जो प्रयत्न है, उसी को प्रत्याहार कहते हैं।
मनुष्य जो कुछ भी देखता है, वह सब ब्रह्म ही है, इस प्रकार समझते हुए ब्रह्म में चित्त को एकाग्र कर लेना ही प्रत्याहार है, ऐसा ब्रह्मवेत्ता कहते हैं।
मनुष्य मृत्यु पर्यन्त जो कुछ भी पवित्र अथवा अपवित्र कार्य करता है, वह सभी कुछ परमात्मा को ही समर्पित कर देना चाहिए, यह भी प्रत्याहार कहा गया है।
अथवा नित्य एवं काम्य सभी तरह के कर्मों को भगवान् की सेवा प्रार्थना के भाव से करना चाहिए।
सभी काम्य कर्मों के द्वारा भगवान् का पूजन करने को भी प्रत्याहार कहते हैं, अथवा वायु को एक जगह से खींचकर दूसरी जगह पर प्रतिष्ठित करे,
यथा-दाँत के मूलभाग से वायु को खींचकर के उसे कण्ठ में प्रतिष्ठित करे, कण्ठ से हृदय क्षेत्र में स्थिर करे, हृदय से खींचकर उसे नाभि-प्रदेश में ले जाये,
नाभि प्रदेश से कुण्डलिनी में स्थापित करे, कुण्डलिनी क्षेत्र से हटाकर विद्वान् पुरुष उसे मूलाधार में रोके,
तत्पश्चात् अपानवायु के स्थान से उस वायु को हटाकर कटि-प्रदेश के दोनों भागों में स्थिर करे और वहाँ से जाँघों के मध्य भाग में ले जाये। जाँघों से दोनों घुटनों में, घुटनों से पिण्डलियों में और पिण्डलियों से पैर के अंगूठे में उस प्राणवायु को स्थापित करे।
प्रत्याहार में पारंगत विद्वानों ने प्राचीनकाल से उपर्युक्त इसी क्रिया को ही प्रत्याहार के नाम से बतलाया है।
इस भाँति प्रत्याहार की क्रिया में रत बुद्धिमान् पुरुष के सभी पाप एवं जन्म-मृत्युरूप समस्त व्याधियाँ स्वयमेव नष्ट हो जाती हैं।
स्वस्तिक आसन का आश्रय प्राप्त कर ज्ञानी मनुष्य शान्त चित्त से स्थान ग्रहण करे तथा नासिका के दोनों छिद्रों से प्राणवायु को भीतर खींचकर, उसे पैर से लेकर सिर तक के सभी स्थानों में पूरा कर दे। दोनों पैरों में, मूलाधार में, नाभिकेन्द्र में, हृदय के मध्य भाग में, कण्ठ के मूल में, तालु में, भौहों के बीच में, ललाट में एवं सिर में वायु को प्रतिष्ठित करे, (यह वायु प्रतिष्ठितात्मक प्रत्याहार है)।
ज्ञानी पुरुष चित्त को एकाग्र करके शरीर से आत्म-बुद्धि को अलग कर उसे, खुद ही निर्द्वन्द्व एवं निर्विकल्प स्वरूप में अपने अन्तरात्मा में स्थित करे।
वेदान्ततत्त्व के ज्ञाता विद्वानों ने इसी को हो वास्तविक प्रत्याहार कहा है। इस प्रकार प्रत्याहार का अभ्यास करने वाले मनुष्य के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है।
Krishjan
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