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जाबाल दर्शन • अध्याय 7 • श्लोक 5
काम्यानि च तथा कुर्यात्प्रत्याहारः स उच्यते। अथवा वायुमाकृष्य स्थानात्स्थानं निरोधयेत् ॥
सभी काम्य कर्मों के द्वारा भगवान् का पूजन करने को भी प्रत्याहार कहते हैं, अथवा वायु को एक जगह से खींचकर दूसरी जगह पर प्रतिष्ठित करे,
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