पूरयेदनिलं विद्वानापादतलमस्तकम्। पश्चात्पादद्वये तद्वन्मूलाधारे तथैव च नाभिकन्दे च हुन्मध्ये कण्ठमूले च तालुके । ध्रुवोर्मध्ये ललाटे च तथा मूर्धनि धारयेत् ॥
स्वस्तिक आसन का आश्रय प्राप्त कर ज्ञानी मनुष्य शान्त चित्त से स्थान ग्रहण करे तथा नासिका के दोनों छिद्रों से प्राणवायु को भीतर खींचकर, उसे पैर से लेकर सिर तक के सभी स्थानों में पूरा कर दे। दोनों पैरों में, मूलाधार में, नाभिकेन्द्र में, हृदय के मध्य भाग में, कण्ठ के मूल में, तालु में, भौहों के बीच में, ललाट में एवं सिर में वायु को प्रतिष्ठित करे, (यह वायु प्रतिष्ठितात्मक प्रत्याहार है)।
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