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जाबाल दर्शन • अध्याय 7 • श्लोक 13
प्रत्याहारः समाख्यातः साक्षाद्वेदान्तवेदिभिः । एवमभ्यसतस्तस्य न किंचिदपि दुर्लभम् ॥
वेदान्ततत्त्व के ज्ञाता विद्वानों ने इसी को हो वास्तविक प्रत्याहार कहा है। इस प्रकार प्रत्याहार का अभ्यास करने वाले मनुष्य के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं है।
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