अधापानात्कटिद्वन्द्वे तथोरौ च सुमध्यमे । तस्माज्जानुद्वये जड्ने पादाङ्गुष्ठे निरोधयेत् ॥
तत्पश्चात् अपानवायु के स्थान से उस वायु को हटाकर कटि-प्रदेश के दोनों भागों में स्थिर करे और वहाँ से जाँघों के मध्य भाग में ले जाये। जाँघों से दोनों घुटनों में, घुटनों से पिण्डलियों में और पिण्डलियों से पैर के अंगूठे में उस प्राणवायु को स्थापित करे।
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