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जाबाल दर्शन • अध्याय 7 • श्लोक 4
तत्सर्वं ब्रह्मणे कुर्यात्प्रत्याहारः स उच्यते। अथवा नित्यकर्माणि ब्रह्माराधनबुद्धितः ॥
अथवा नित्य एवं काम्य सभी तरह के कर्मों को भगवान् की सेवा प्रार्थना के भाव से करना चाहिए।
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