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अध्याय 6 — षष्ठोपदेश
घेरण्ड संहिता
22 श्लोक • केवल अनुवाद
ध्यान के स्थूल, ज्योति और सूक्ष्म ये तीन प्रकार कहे हैं। स्थूल मूर्तिमय कहा गया है, ज्योति तेजस्वरूप तथा सूक्ष्म बिन्दुमय ब्रह्म है, जो कुंडली से परे देवता है। (समीक्षा - बिन्दुमय ध्यान कुंडलिनी शक्ति से जाग्रत होने वाला ध्यान है। अत: कुंडली परादेवता कहा है।)
(विधि बताते हैं-) अपने हृदय में उत्तम अमृत समुद्र का ध्यान करे। उसके मध्य में बालुकामय रत्नों से परिपूर्ण रत्नदीप का ध्यान करे।
उसके चारों ओर निम्ब के वृक्ष अनेक पुष्पों से सुशोभित हैं। निम्ब वन के पुष्प मानो खाई जैसे हैं।
तथा मालती, मल्लिका, चमेली, केशर, चंपा, पारिजात (बकायन) और स्थल कमलो की सुगंध से सब दिशायें (सुगंधित हैं, ऐसा ध्यान करे)।
उसके मध्य में योगी कल्पवृक्ष का स्मरण करे, उसमें चारों वेद नित्य फल, फूलों से समन्वित हैं।
वहाँ भ्रमर, कोयल गूँज रहे है और बोल रहे हैं, वहाँ स्थिर होकर (ध्यानस्य होकर) मणिमण्डप का (ध्यान करे)।
उसके मध्य योगी मनोहर पलंग का ध्यान करे। तथा गुरु-उक्त ध्यान और इष्ट देवता का ध्यान करे।
जिस देव का जो भूषण और वाहन है, उसका नित्य ध्यान करे, यही स्थूल ध्यान कहा गया है।
(प्रकारान्तर स्थूलध्यान बताते हैँ-) बारह पत्तों से युक्त एक कमल सहस्रार नामक महापदम में स्थित है, कर्णिका में उसका ध्यान करे।
वह शुक्ल वर्ण, तेजोमय, ह,ल,क्ष,म,ल,व,र,यूं,ह, स,खफें इन द्वादशबीजों से भूषित (यह कमल है)।
उसके मध्य में कर्णिका में अ,क,थ, ये तीन रेखायें ह,ल,क्ष इन तीन से युक्त ॐ०कार विराजित है।
नादबिन्दु से युक्त मनोहर पीठ का वहाँ ध्यान करे, उसके ऊपर हंस का जोड़ा है और वहाँ पादुका स्थित हैं।
वहाँ द्विभुजाओं से शोभित और त्रिनेत्र, श्वेताम्बरधारी, श्वेत गंध का लेपन जिन्होंने किया है, ऐसे गुरुदेव का ध्यान करे।
श्वेतपुष्प की माला वे पहने हैं, लाल वर्ण की शक्ति से सुशोभित हैं, इस प्रकार गुरु के ध्यान से स्थूल ध्यान सधता है।
स्थूलध्यान कहने के बाद अब ज्योतिध्यान को सुनो, जिसके ध्यान से योगसिद्धि और आत्मसिद्धि का प्रत्यक्ष. होता है।
मूलाधार में सर्पाकार कुण्डलिनी है। वहाँ दीपज्योति के समान जीवात्मा विद्यमान है। वहाँ तेजोमय ब्रह्म का ध्यान करें, जो परात्पर है (पर से भी पर है)।
(प्रकारान्तर से ज्योतिध्यान विधि कहते हैं-) भ्रुवो के मध्य और मन के ऊपर प्रणवात्मक जो तेज है, वही ज्वालावली युक्त जो ध्यान है, उसका ध्यान करे।
हे चण्डकापालि! तेजोध्यान कहने के बाद अब सूक्ष्मध्यान को में कहता हूँ। वह भाग्यवान् है, जिसकी कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है।
(तब) नेत्ररंध्रों से निकलकर आत्मा के योग से राजमार्ग में विहार करता है और चंचलता के कारण दिखलायी नहीं देता है।
योगी इसे शांभवी मुद्रा के ध्यानयोग से सिद्ध करता है। यह सृक्ष्मध्यान देवों को भी दुर्लभ और गोपनीय है।
स्थूलध्यान से सौ गुना यह तेजोध्यान कहा जाता है और तेजोध्यान से लक्षगुना पर से भी पर यह सूक्ष्मध्यान है।
इस प्रकार हे चण्ड! यह दुर्लभ ध्यानयोग कहा है। इससे आत्मा का साक्षात्कार होता है, अत: यह ध्यान सबसे विशेष कहा जाता है।
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