आत्मना सहयोगेन नेव्ररन्ध्राद्विनिर्गता ।
विहरेद् राजमार्गे च चञ्चलत्वान्न दृश्यते ॥
(तब) नेत्ररंध्रों से निकलकर आत्मा के योग से राजमार्ग में विहार करता है और चंचलता के कारण दिखलायी नहीं देता है।
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