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अध्याय 57 — अथ वज्रलेपलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
8 श्लोक • केवल अनुवाद
तेन्दू के कच्चे फल, कैथ के कच्चे फल, सेमल के फूल, शल्लकी ( सालई) वृक्ष के बीज, धन्वन वृक्ष की छाल और वच-इन सबको एक द्रोणतुल्य जल में मिलाकर काढ़ा बनाते हुये
जब अष्टमांश शेष रह जाय तब उसको उतार ले। बाद में उसमें श्रीवासक (सरल) वृक्ष का गोंद, बोल, गूगल, भिलावा,
कुन्दरूक ( देवदारु वृक्ष का गोंद), सर्ज (सखुआ) का गोंद, अलसी, बेल की गिरी-इन सबको पीसकर मिला देने पर 'वज्रलेप' नामक काढा बन जाता है।
गरम किये हुये वज्रलेप को देवप्रासाद, हवेली, वलभी, शिवलिङ्ग, देवप्रतिमा, भीत और कूप में यदि लगाया जाय तो यह एक करोड़ वर्ष तक नहीं छूटता है।
पूर्व से सिद्ध किये गये क्वाथ में लाख, कुन्दरूक (देवदारु वृक्ष का गोंद), गूगल, घर के धुयें का जाला, कैथ का फल, बेल की गिरी, नागबला का फल, महुये का फल, मञ्जीठ,
बोल, आँवला- इन सबको पीस कर डाले तो प्रथम वज्रलेप के गुणों से युत पूर्वोक्त कामों के लिये ही एक दूसरा वज्रलेप तैयार हो जाता है।
पूर्व में सिद्ध किये हुये काढ़े में गौ, भैंस, बकरा-इनका सींग; गदहे का बाल, भैंस का चमड़ा, गव्य (गोबर), नीम का फल, कैथ का फल, बोल-इन सबको पीसकर मिलाने पर पूर्वकथित गुणों से युत पूर्वोक्त कार्यों के लिये ही तीसरा लेप सिद्ध हो जाता है, इसका नाम 'वज्रवल' कहा गया है।
आठ भाग सीसा, दो भाग कांसा, एक भाग पीतल-इन सबको एक जगह गलाने से मयकथित 'वज्रसङ्घात' नामक चौथा लेप सिद्ध होता है।
Krishjan
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