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बृहत्संहिता • अध्याय 57 • श्लोक 3
श्रीवासकरसगुग्गुलुभल्लातककुन्दुरूकसर्जरसैः । अतसीबिल्वैश्च युतः कल्कोऽयं वज्रलेपाख्यः ॥
कुन्दरूक ( देवदारु वृक्ष का गोंद), सर्ज (सखुआ) का गोंद, अलसी, बेल की गिरी-इन सबको पीसकर मिला देने पर 'वज्रलेप' नामक काढा बन जाता है।
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