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अध्याय 41 — अथ द्रव्यनिश्चयाध्यायः
बृहत्संहिता
13 श्लोक • केवल अनुवाद
मुनियों ने शुभाशुभ फल जानने के लिये जिन द्रव्यों के जो अधिप राशि कहे हैं, उनको आगम से लेकर मैं यहाँ कहता हूँ।
वस्त्र, भेड़ के रोम से निर्मित वख, कुतुप (बकरी के रोम से निर्मित यख), मसूर, गेहूँ, रालक, जौ और स्थल (जल से रहित भूमि) में उत्पन्न औषधियों का स्वामी मेष राति है।
वरू, पुष्प, गेहूँ, शालिधान्य, जौ, भैंस और बैल का स्वामी वृष है। धान्य, शारदीय लता, शालूक (कुमुदकन्द) और कपास का स्वामी मिथुन है।
कोदो, केला, दूब, सब फल, कन्द (शकरकन्द आदि), पत्र (सुगन्धपत्र) एवं चोच (नारियल) का स्वामी कर्क है। भूसी वाले धान्य, रस (मधुर आदि छः रस), सिंह आदि प्राणी, त्वचा और गुड़ का स्वामी सिंह है।
अतसी (अलसी = तिसी), कलाय (उड़द), कुलथी, गेहूँ, मूंग और निष्पाव ( शालिधान्य या शिम्बि धान्य) का स्वामी कन्या है। मसूर, जौ, गेहूँ और सरसों का स्वामी तुला है।
ईख (गन्ना), लता के फल, लोहा और छाग तथा भेड़-सम्बन्धी वस्तुओं का स्वामी वृश्चिक है। घोड़ा, नमक, वख, तिल, धान्य और मूलोत्पत्र धान्यों का स्वामी धनु है।
वृक्ष, गुल्म (सामयिक वृक्ष), आदि (लता-वल्ली), सैक्य (वल्ली फल आदि), ईख (गन्ना), सोना और लोहे का स्वामी मकर है। जल में उत्पन्न वस्तु, फल, फूल, रस और चित्र वस्तु का स्वामी कुम्भ है।
कपाल-सम्भय-रत्न (मुक्ताफल), जल में उत्पन्न वस्तु, हीरा, नाना प्रकार के तेल और मछली से उत्पन्न मुक्ता आदि का स्वामी मीन है।
जिस राशि से चतुर्थ, दशम, द्वितीय, एकादश, सप्तम, नवम या पश्चम में बृहस्पति तथा द्वितीय, एकादश, दशम, पश्चम या अष्टम में बुध अवस्थित हो उस राशि के कथित द्रव्यों की वृद्धि करता है। जिस राशि से षष्ठ या सप्तम में शुक्र हो,
उस राशि के कथित द्रव्यों की हानि और शेष स्थान (प्रथम, द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम, अष्टम, नवम, दशम, एकादश या द्वादश) में स्थित हो तो उनको वृद्धि करता है तथा जिस राशि से पापग्रह ( रवि, मङ्गल और शनैहार) उपचय तृतीय, षष्ठ या एकादश) में स्थित हो, उसके द्रव्यों की वृद्धि और शेष स्थान (प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पश्चम, सप्तम, अष्टम, नवम, दशम या द्वादश में स्थित हो तो हानि करता है।
जिस राशि से पीड़ास्थान ( उपचयस्थान) में स्थित होकर पापग्रह (रवि, मङ्गल, शनि) बली ( मित्रगृह, स्वगृह, उच्च या स्वनवांश में स्थित या शुभग्रहों से दृष्ट ) हो तो उस राशि के कथित द्रव्य अधिक मूल्य वाले और अलभ्य होते हैं।
जिस राशि से इष्ट स्थान ( पूर्व कथित वृद्धि स्थान) में बली होकर शुभग्रह (बुध, गुरु और शुक्र ) स्थित हों तो उस राशि के कथित द्रव्य अल्प मूल्य से मिलने वाले और प्रिय होते हैं।
गोचर-पीड़ा में स्थित राशि (बृहस्पति आदि ग्रहों को उक्त चतुर्थ आदि शुभ स्थानों से भित्र स्थान में स्थित होने पर राशि गोचर पीड़ा में स्थित रहती है, ऐसी राशि) यदि बली शुभग्रह ( बुध, गुरु और शुक्र) से देखी जाती हो तो पोड़ा नहीं करती है अर्थात् वे द्रव्य सम मूल्य में रहते हैं। यदि पापग्रह (रवि, मंगल और शनि ) से देखी जाती हो तो उस राशि के कथित द्रव्य महर्ष और दुर्लभ होते हैं।
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