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अध्याय 108 — अथ शास्त्रानुक्रमण्यध्यायः
बृहत्संहिता
14 श्लोक • केवल अनुवाद
पहले शाखोपनय, तत्पश्चात् सांवत्सरसूत्र, अर्कचार, चन्द्रचार, राहुचार, भौमचार, बुधचार, गुरुचार, शुक्रचार, शनिचार, केतुचार ।।१।। गतार्थेयमार्या। शिखिप्रहाः केतवः। चारशब्दोऽत्र सम्बध्यते ।
अगस्त्यचार, सप्तर्षिचार, कूर्मविभाग, नक्षत्रव्यूह, ग्रहभक्तियोग, ग्रहयुद्ध ।।२।। सप्तर्षीणां चारो महभक्तिर्महविमदों अहयुद्धम्। गताथैयमार्या ।
शशिग्रहसमागम, ग्रहवर्षफल, ग्रहमृद्गङ्गाटक, मेघों के गर्भलक्षण।
गर्भधारण, प्रवर्षण, रोहिणीयोग, स्वातियोग, आषाढ़ीयोन, यातचक्र, सद्योवर्पण, कुसुमलता, सन्ध्यालक्षण, दिग्वहतक्षण ।
भूकम्पलक्षण, उल्कालक्षण, परिवेषलक्षण, इन्द्रायुधलक्षण, गन्धर्वनगरलक्षण, प्रतिसूर्यलक्षण, निर्षांतलक्षण, सस्यजातक, द्रव्यनिश्चय, अर्घकाण्ड ।
इन्द्रध्वजसम्पत्, नीराजनविधि, खञ्जनलक्षण, उत्पातलक्षण, मयूरचित्रक, पुष्यस्नान, पट्टलक्षण, खङ्गलक्षण, वास्तुविद्या ।
उदकार्गल, वृक्षायुर्वेद, प्रासादलक्षण, वज्रलेप, प्रतिमालक्षण, वनप्रवेश, सुरभवन- प्रतिष्ठा।
गोलक्षण, डानलक्षण, कुक्कु प्रक्षण, कूर्मलक्षण, छागलक्षण, पञ्चमहापुरुषलक्षण, खोलक्षण, वखविच्छेदलक्षण।
चामरलक्षण, दण्डपरीक्षा, सीप्रशंसा, सौभाग्यकरण, कान्दर्षिक, गन्धयुक्ति, पुंस्त्रीसमागम, शयनविधि ।
वज्रपरीक्षा, मुक्तालक्षण, पद्मरागपरीक्षा, मरकतपरीक्षा, दीपलक्षण, दन्तकाष्ठलक्षण, शाकुनमिश्रफल ।
अन्तरचक्र, विरुत, श्वचक्र, शिवारुत, मृगचेष्टा, अश्वचेष्टा, वायसविद्या। यहाँ पर शिवारुताध्याय के अन्तर्गत श्वचेष्टित और गोचेष्टिताध्याय के अन्तर्गत उष्ट्री, व्याघ्नी, सिंहाँ आदि प्रधान सभी जीवों का लक्षण कहा गया है तथा मृग जातियों के मध्य में मार्जार, व्याघ्र, सूकर, ऊँट आदि जीवों का शृगाल की तरह लक्षण कहा गया है।
पाकाध्याय, नक्षत्रगुण, तिथिगुण, करणगुण, नक्षत्रजातक, ग्रहगोचराध्याय, नक्षत्रपुरुष, रूपसत्र-ये अध्याय इस ग्रन्थ के अन्तर्गत हैं।
यहाँ पर जिस क्रम से पठित किये गये हैं, उसी क्रम से इस ग्रन्थ में एक सौ अध्याय बनाये गये हैं। इसमें एक सौ कम चार हजार श्लोक दिये गये हैं। वातचक्र, अङ्गविद्या, पिटकलक्षण, अश्वलक्षण, गजलक्षण-ये पाँच अध्याय इस प्रमाण से अलग हैं। इन अध्यायों की पद्यसंख्या मिलाकर कुल चार हजार श्लोक होते हैं।
इसी के अन्तर्भूत परिशेष समस्त विषय 'यात्रा' नामक पुस्तक में कहे गये हैं तथा मैंने बहुत आश्चर्य करने वाला जातक और बहुत प्रशस्त करण (पञ्चसिद्धान्तिका) कहा है।
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