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बृहत्संहिता • अध्याय 108 • श्लोक 14
अत्रैवान्तर्भूतं परिशेषं निगदितं च यात्रायाम् । बह्वाश्चर्य जातकमुक्तं करणं च बहुचोद्यम् ॥
इसी के अन्तर्भूत परिशेष समस्त विषय 'यात्रा' नामक पुस्तक में कहे गये हैं तथा मैंने बहुत आश्चर्य करने वाला जातक और बहुत प्रशस्त करण (पञ्चसिद्धान्तिका) कहा है।
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