यहाँ पर जिस क्रम से पठित किये गये हैं, उसी क्रम से इस ग्रन्थ में एक सौ अध्याय बनाये गये हैं। इसमें एक सौ कम चार हजार श्लोक दिये गये हैं। वातचक्र, अङ्गविद्या, पिटकलक्षण, अश्वलक्षण, गजलक्षण-ये पाँच अध्याय इस प्रमाण से अलग हैं। इन अध्यायों की पद्यसंख्या मिलाकर कुल चार हजार श्लोक होते हैं।
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