अध्याय 5 — पञ्चमः खण्डः
सुबाल
15 श्लोक • केवल अनुवाद
(इस खण्ड में ज्ञानेन्द्रियों, अन्तःकरण एवं कर्मेन्द्रियों के माध्यम से आत्मा की सक्रियता का विवेचन किया गया है। इस प्रकरण में जो आत्या से सम्बद्ध है, उसे अध्यात्म, भौतिक सृष्टि से सम्बद्ध को अधिभूत तथा देव शक्तियों से सम्बद्ध को अधिदैवत कहा गया है। जीवन की विभित्र धाराओं की व्याख्या इन्हीं तीनों विशेषणों के संदर्भ में की गयी है-)
(इस प्रकार जाग्रत् आदि कोशत्रय में निवास करने वाला) आत्मा उन-उन स्थानों में रहने वालों को स्थान प्रदान करता है। नाड़ी उनका मूल साधन है। चक्षु अध्यात्म है। देखा जाने वाला (द्रष्टव्य) पदार्थ अधिभूत है और आदित्य अधिदैवत है। नाड़ी उसका मूल कारण है। जो चक्षु इन्द्रिय में, द्रष्टव्य पदार्थ में, आदित्य में, नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में, हृदयाकाश में और इस सम्पूर्ण शरीर में संचरण करता है, यह आत्मा है। उस आत्मा की ही उपासना करनी चाहिए, जो अजर, अमर, अभय, अशोक और अनन्त है।
(नाड़ी को अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत का मूलकारण कहा गया है। दृष्टि का विकास और विलय उससे सम्बद्ध नाड़ी में होता है, यह स्पष्ट है। जिस प्रकार आत्मा के स्थान शरीर में विभिन्न गाड़ियाँ हैं, वैसे ही अधिभूत के लिए प्रकृति में तथा अधिदैवत के लिए विराट् पुरुष में नाड़ियाँ हैं। आगे नवम खण्ड में स्पष्ट किया गया है कि आदित्य आदि भी उनसे सम्बद्ध विराट् नाड़ियों से ही उद्भूत और उन्हीं में विलीन होते हैं।)
इसी प्रकार श्रोत्रेन्द्रिय भी अध्यात्म है, श्रोतव्य शब्द अधिभूत है और दिशाएँ अधिदैवत हैं। इन तीनों का मूल कारण नाड़ी है। श्रोत्र में, श्रोतव्य शब्द में, दिशाओं में, नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में, हृदयाकाश में और सम्पूर्ण शरीर के अन्दर जो संचरित होता है, वह आत्मा है। इसी की उपासना करनी चाहिए। यह जरारहित, मृत्युरहित, भयरहित, शोकरहित और अनन्त है।
इसी प्रकार उपस्थेन्द्रिय अध्यात्म है, आनन्दवितव्य (आनन्द का विषय) अधिभूत है और प्रजापति अधिदैवत हैं। नाड़ी इनका मूल स्थान है। जो उपस्थ (जननेन्द्रिय) में, जो आनंद के विषय में, जो प्रजापति में, जो नाड़ी में, जो प्राण में, जो विज्ञान में, जो आनन्द में, जो हृदयाकाश में और जो इस सम्पूर्ण शरीर में संचरित होता है, वही यह आत्मा है। इस आत्मा की ही उपासना करनी चाहिए। यह जरा रहित, मरण रहित, भयरहित, शोकरहित और अनन्त है।
यह (तुर्यातिरिक्त) ईश्वर सर्वज्ञ है, यह सर्वेश है, सर्वाधिपति है, अन्तर्यामी है और यही सबका उत्पत्ति स्थान है। समस्त सुखों के द्वारा यही उपास्य है, पर यह समस्त सुखों की उपासना नहीं करता। यह वेद और शास्त्रों का भी उपास्य है, पर यह वेद और शास्त्रों की उपासना नहीं करता। सभी अन्न इसके हैं, पर यह किसी का अन्न नहीं है। इसके अतिरिक्त यह सभी का नेत्र, सब को आज्ञा देने वाला, अन्नमय भूतों (प्राणियों) की आत्मा, प्राणमय इन्द्रियों को आत्मा, मनोमय संकल्प स्वरूप, विज्ञानमय कालरूप, आनन्दमय और लयात्मक है। उसमें अद्वैत (एकत्व) नहीं है, तो द्वैत कहाँ हो सकता है? वह मर्त्य नहीं है, तो अमृत कैसे हो सकता है? वह न अन्तः प्रज्ञ है और न बाह्यप्रज्ञ है। वह दोनों (अन्तर् और बाह्य) में भी प्रज्ञ नहीं है। वह प्रज्ञानधन नहीं है, न प्रज्ञ (बहुत जानने वाला) ही है, न अप्रज्ञ (बिना जानने वाला) होकर भी इसे कुछ जानना शेष है। इसके अतिरिक्त निर्वाण के लिए और कोई उपदेश (अनुशासन) नहीं है अर्थात् मोक्ष के लिए यही अनुशासन है। यही वेद की शिक्षा व अनुशासन है।