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सुबाल • अध्याय 5 • श्लोक 1
स्थानानि स्थानिध्यो यच्छति नाडी तेषां निबन्धनं चक्षुरध्यात्मं द्रष्टव्यमधिभूतमादित्य-स्तत्राधिदैवतं नाडी तेषां निबन्धनं यश्चक्षुषि यो द्रष्टव्ये य आदित्ये यो नाड्यां यः प्राणे यो विज्ञाने य आनन्दे यो हृद्याकाशे य एतस्मिन्सर्वस्मिन्नन्तरे संचरति सोऽयमात्मा तमात्या-नमुपासीताजरममृतमध्यमशोकमनन्तम् ॥
(इस खण्ड में ज्ञानेन्द्रियों, अन्तःकरण एवं कर्मेन्द्रियों के माध्यम से आत्मा की सक्रियता का विवेचन किया गया है। इस प्रकरण में जो आत्या से सम्बद्ध है, उसे अध्यात्म, भौतिक सृष्टि से सम्बद्ध को अधिभूत तथा देव शक्तियों से सम्बद्ध को अधिदैवत कहा गया है। जीवन की विभित्र धाराओं की व्याख्या इन्हीं तीनों विशेषणों के संदर्भ में की गयी है-) (इस प्रकार जाग्रत् आदि कोशत्रय में निवास करने वाला) आत्मा उन-उन स्थानों में रहने वालों को स्थान प्रदान करता है। नाड़ी उनका मूल साधन है। चक्षु अध्यात्म है। देखा जाने वाला (द्रष्टव्य) पदार्थ अधिभूत है और आदित्य अधिदैवत है। नाड़ी उसका मूल कारण है। जो चक्षु इन्द्रिय में, द्रष्टव्य पदार्थ में, आदित्य में, नाड़ी में, प्राण में, विज्ञान में, आनन्द में, हृदयाकाश में और इस सम्पूर्ण शरीर में संचरण करता है, यह आत्मा है। उस आत्मा की ही उपासना करनी चाहिए, जो अजर, अमर, अभय, अशोक और अनन्त है। (नाड़ी को अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत का मूलकारण कहा गया है। दृष्टि का विकास और विलय उससे सम्बद्ध नाड़ी में होता है, यह स्पष्ट है। जिस प्रकार आत्मा के स्थान शरीर में विभिन्न गाड़ियाँ हैं, वैसे ही अधिभूत के लिए प्रकृति में तथा अधिदैवत के लिए विराट् पुरुष में नाड़ियाँ हैं। आगे नवम खण्ड में स्पष्ट किया गया है कि आदित्य आदि भी उनसे सम्बद्ध विराट् नाड़ियों से ही उद्भूत और उन्हीं में विलीन होते हैं।)
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