एव सर्वज्ञ एव सर्वेश्वर एष सर्वाधिपतिरेषो ऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य सर्वसौख्यैरुपा-स्यमानो न च सर्वसौख्यान्युपास्यति वेदशास्त्रैरुपास्यमानो न च वेदशास्त्राण्युपास्यति यस्यान्नमिदं सर्वे न च योऽन्नं भवत्यतः परं सर्वनयनः प्रशास्तान्नमयो भूतात्मा प्राणमय इन्द्रियात्या मनोमयः संकल्पात्मा विज्ञानमयः कालात्यानन्दमयो लयात्मैकत्वं नास्ति द्वैतं कुतो मत्र्यं नास्त्यमृतं कुतो नान्तः प्रज्ञो न बहिःप्रज्ञो नोभयतः प्रज्ञो न प्रज्ञानधनो न प्रज्ञो नाप्रज्ञोऽपि नो विदितं वेद्यं नास्तीत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥
यह (तुर्यातिरिक्त) ईश्वर सर्वज्ञ है, यह सर्वेश है, सर्वाधिपति है, अन्तर्यामी है और यही सबका उत्पत्ति स्थान है। समस्त सुखों के द्वारा यही उपास्य है, पर यह समस्त सुखों की उपासना नहीं करता। यह वेद और शास्त्रों का भी उपास्य है, पर यह वेद और शास्त्रों की उपासना नहीं करता। सभी अन्न इसके हैं, पर यह किसी का अन्न नहीं है। इसके अतिरिक्त यह सभी का नेत्र, सब को आज्ञा देने वाला, अन्नमय भूतों (प्राणियों) की आत्मा, प्राणमय इन्द्रियों को आत्मा, मनोमय संकल्प स्वरूप, विज्ञानमय कालरूप, आनन्दमय और लयात्मक है। उसमें अद्वैत (एकत्व) नहीं है, तो द्वैत कहाँ हो सकता है? वह मर्त्य नहीं है, तो अमृत कैसे हो सकता है? वह न अन्तः प्रज्ञ है और न बाह्यप्रज्ञ है। वह दोनों (अन्तर् और बाह्य) में भी प्रज्ञ नहीं है। वह प्रज्ञानधन नहीं है, न प्रज्ञ (बहुत जानने वाला) ही है, न अप्रज्ञ (बिना जानने वाला) होकर भी इसे कुछ जानना शेष है। इसके अतिरिक्त निर्वाण के लिए और कोई उपदेश (अनुशासन) नहीं है अर्थात् मोक्ष के लिए यही अनुशासन है। यही वेद की शिक्षा व अनुशासन है।
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