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अध्याय 9 — लिङ्गदेहादिनिरूपण

प्रबोधसुधाकर
9 श्लोक • केवल अनुवाद
स्थूल शरीर के भीतर लिङ्गदेह है, उसके भीतर कारणशरीर है और उसके भी भीतर महाकारण नामक तुरोप आत्मा है।
स्थूल शरीर का तो पहले निरूपण हो चुका, अब सूक्ष्मादि का वर्णन करते हैं। जिसको श्रुति ने 'अंगुष्ठमात्र पुरुष' कहा है वही यह सूक्ष्म शरीर है।
पाँच सूक्ष्म महाभूत, पाँच प्राण, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और सोलहवाँ अन्तःकरण - इन तत्त्वों के समूह का नाम ही 'सूक्ष्म शरीर' है।
उस लिंगदेह के अन्दर जो वासनाओं का समूह है वही 'कारण-शरीर' कहलाता है। उसकी भी प्रवृत्तियों के कारण और बुद्धि के आश्रय को 'तुर्य' (महाकारण) समझना चाहिये।
लिंगदेह की साररूपा बुद्धि में प्रतिविम्बित जो शुद्ध चैतन्य है उसी को पूर्वाचार्यों ने जीव कहा है, जिसके कारण शरीर में 'मैं' इस प्रकार की स्फूर्ति होती है।
जिस प्रकार अति चश्ञ्चल तरंगों के कारण सूर्य का प्रतिविम्ब भी चञ्चल प्रतीत होता है, उसी प्रकार चित्त की चञ्चलता से चैतन्य में भी चञ्चलता प्रतीत होती है।
शंका-जल में पड़ा हुआ सूर्य का प्रतिविम्ब तो अन्यान्य पदार्थों को प्रकाशित करता है, क्या आत्म-प्रतिविम्ब भी उसी के समान दूसरे पदार्थों को प्रकाशित किया करता है!
समाधान - काँसी आदि के पात्रों में जो सूर्य का तेज प्रतिविम्बित होता है, वह घर के भीतर प्रवेश कर अन्य पदार्थों को प्रकाशित किया करता है,
उसी प्रकार बुद्धि में पड़ा हुआ चेतन का प्रतिविम्ब जो जीव-भाव को प्राप्त हुआ है वह नेत्रादि इन्द्रियों के द्वारा बाह्य पदार्थो को प्रकाशित करता है।
Krishjan
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