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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 9 • श्लोक 6
चरतरतरङ्गसङ्गात्प्रतिबिम्बं भास्करस्य च चलं स्यात् । अस्ति तथा चञ्चलता चैतन्ये चित्तचाञ्चल्यात् ॥
जिस प्रकार अति चश्ञ्चल तरंगों के कारण सूर्य का प्रतिविम्ब भी चञ्चल प्रतीत होता है, उसी प्रकार चित्त की चञ्चलता से चैतन्य में भी चञ्चलता प्रतीत होती है।
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