तत्सारभूतबुद्धो यत्प्रतिफलितं तु शुद्धचैतन्यम् ।
जीवः स उक्त आद्यैर्योऽहमिति स्फूर्तिकृद्वपुषि ॥
लिंगदेह की साररूपा बुद्धि में प्रतिविम्बित जो शुद्ध चैतन्य है उसी को पूर्वाचार्यों ने जीव कहा है, जिसके कारण शरीर में 'मैं' इस प्रकार की स्फूर्ति होती है।
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