उस लिंगदेह के अन्दर जो वासनाओं का समूह है वही 'कारण-शरीर' कहलाता है। उसकी भी प्रवृत्तियों के कारण और बुद्धि के आश्रय को 'तुर्य' (महाकारण) समझना चाहिये।
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