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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 9 • श्लोक 4
तत्कारणं स्मृतं यत्तस्यान्तर्वासनाजालम् । तस्य प्रवृत्तिहेतुर्बुद्ध्याश्रयमत्र तुर्यं स्यात् ॥
उस लिंगदेह के अन्दर जो वासनाओं का समूह है वही 'कारण-शरीर' कहलाता है। उसकी भी प्रवृत्तियों के कारण और बुद्धि के आश्रय को 'तुर्य' (महाकारण) समझना चाहिये।
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