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अध्याय 7 — आत्मसिद्धि

प्रबोधसुधाकर
9 श्लोक • केवल अनुवाद
वैराग्य हो जाने पर भी बिना बोध के आनन्द की प्राप्ति नहीं होती, बोध गुरु के उपदेश से ही होता है, अतः सब से पहले गुरुदेव की शरण में जाय।
यद्यपि (मेघ में रहने वाला) समुद्र का जल सामने भरा पड़ा है, और उसे ऊपर उड़ाने वाला प्रेरक वायु भी वहाँ है परन्तु प्यास से तड़पता हुआ चातक मेघ की ही प्रतीक्षा करता है (इसी प्रकार ब्रह्म सर्वत्र विराजमान है तथापि जिज्ञासु को उसका ज्ञान गुरु के द्वारा ही होता है।)
आत्मा की प्रतीति शास्त्र, गुरु और अपना अन्तःकरण इन तीन साधनों से होती बतलायी जाती है। उनमें प्रथम प्रतीति शास्त्र द्वारा होती है, जैसे पहले लोगों से सुनकर यह ज्ञान होता है कि 'गुड़ मीठा होता है'।
तदुपरान्त गुड़ को दूर से देख लेने के समान दूसरी प्रतीति गुरुद्वारा होती है और उससे गुड़भक्षणजनित सुख के समान आत्मा की (साक्षात्) प्रतीति होती है।
रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द तथा अन्यान्य पदार्थ किसके द्वारा अनुभव किये जाते हैं? देह या इन्द्रियों द्वारा तो इनका अनुभव हो नहीं सकता।
क्योंकि मरे हुए प्राणी के देह और इन्द्रियाँ दाह-जन्य दुःख का अनुभव नहीं करते। यदि कहा जाय कि प्राण ही इनका अनुभव करता है, तो सो जाने पर क्या उसे चोर आदि से होने वाली हानि का ज्ञान होता है?
यदि इन्हें मन का विषय कहें तो वह सबका एक साथ ही अनुभव क्यों नहीं कर लेता? वास्तव में वह तो पराधीन है क्योंकि यदि उसे स्वतंत्र माना जाय तो उसको प्रमाद से कौन बचा सकता था?
एक गाढ़ अन्धकारमय घर के भीतर पृथ्वी पर एक स्फुट-प्रकाशमय दीपक रखे, उसके ऊपर एक पाँच छिद्रों वाला घड़ा नीचे को मुख करके स्थापित करे। उसके बाहर प्रत्येक छिद्र के सामने क्रमशः सुन्दर वीणा, कस्तुरी, रत्न और पल्ला रखे।
अब उस कलश के छिद्रों से बाहर निकलने वाले तेज के अंशों से जो उन विविध पदार्थों का पृथक् पृथक् ज्ञान होता है वह किससे होता है? छिद्रों से, कलश से, मृत्तिका से, पात्र से, तैल से या बत्ती से? प्रत्यक्ष-विरुद्ध होने के कारण इनमें से किसी से भी कहना ठीक न होगा; अतः इन पदार्थों के ज्ञान में तो एकमात्र दीपक का प्रकाश ही शरण (कारण) है, इसी प्रकार शरीर में भी प्रत्येक ज्ञान का आधार आत्मा ही है।
Krishjan
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