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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 7 • श्लोक 2
यद्यपि जलधेरुदकं यद्यपि वा प्रेरकोऽनिलस्तत्र । तदपि पिपासाकुलितः प्रतीक्षते चातको मेघम् ॥
यद्यपि (मेघ में रहने वाला) समुद्र का जल सामने भरा पड़ा है, और उसे ऊपर उड़ाने वाला प्रेरक वायु भी वहाँ है परन्तु प्यास से तड़पता हुआ चातक मेघ की ही प्रतीक्षा करता है (इसी प्रकार ब्रह्म सर्वत्र विराजमान है तथापि जिज्ञासु को उसका ज्ञान गुरु के द्वारा ही होता है।)
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