तेजोंशेन पृथक्पदार्थनिवहज्ञानं हि यज्जायते
तद्रन्ध्रैः कलशेन वा किमु मृदो भाण्डेन तैलेन वा ।
किं सूत्रेण न चैतदस्ति रुचिरं प्रत्यक्षबाधादतो
दीपज्योतिरिहैकमेव शरणं देहे तथात्मा स्थितः ॥
अब उस कलश के छिद्रों से बाहर निकलने वाले तेज के अंशों से जो उन विविध पदार्थों का पृथक् पृथक् ज्ञान होता है वह किससे होता है? छिद्रों से, कलश से, मृत्तिका से, पात्र से, तैल से या बत्ती से? प्रत्यक्ष-विरुद्ध होने के कारण इनमें से किसी से भी कहना ठीक न होगा; अतः इन पदार्थों के ज्ञान में तो एकमात्र दीपक का प्रकाश ही शरण (कारण) है, इसी प्रकार शरीर में भी प्रत्येक ज्ञान का आधार आत्मा ही है।
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