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अध्याय 14 — मनोलय

प्रबोधसुधाकर
8 श्लोक • केवल अनुवाद
संसार-ताप से सन्तप्त और नाना योनियों में आने-जाने से श्रान्त (थका) हुआ चित्त परमानन्द को प्राप्त करके फिर कभी चंचल नहीं होता।
अद्वैतानन्द के उद्वेग से जब 'यह क्या है? मैं कौन हूँ! और किसका हूँ?' ऐसी जिज्ञासा से चित्त सुस्त पड़ जाता है तो (अन्त में) वह मूर्छित हो जाता है।
चिरकाल तक आत्मानुभव करते रहने से चित्त आत्माकार हो जाता है, जिस प्रकार समुद्र को जाने वाली नदी अन्त में पूर्णतया समुद्ररूप ही हो जाती है।
आत्मस्वरूप में लगा हुआ चित्त फिर बाह्य विषयों की इच्छा नहीं करता, जैसे दुग्ध में से निकाला हुआ घी फिर दुग्धभाव को प्राप्त नहीं हो सकता।
दृष्टि, द्रष्टा और दृश्य में जो ज्ञानमात्र तत्त्व अनुस्यूत हो रहा है उसमें यदि चित्त लीन हो जाय तो वह मूर्छित हो जाता है।
जब चित्त आत्माभिमुख रहता है, अथवा यों कहो कि जब वह दृङ्‌मात्र हो जाता है उस समय दृश्य और द्रष्टा का भेद नहीं रहता। किन्तु उसके आत्माभिमुख न रहने पर ऐसा नहीं होता।
एक दृङ्‌मात्र में ही द्रष्टा आदि त्रिपुटी का उदय होता है, उस त्रिपुटी का लय हो जाने पर पीछे केवल दृङ्‌मात्र ही रह जाता है।
दर्पण से पूर्व और उसके पीछे भी मुख होता है तभी उसमें उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है। दर्पण यदि टूट जाय तब भी मुख तो ज्यों-का-त्यों ही रहता है, इसी प्रकार आत्मा उपाधि के नष्ट हो जाने पर भी रहता ही है।
Krishjan
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