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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 14 • श्लोक 1
संसारतापतप्तं नानायोनिभ्रमात्परिश्रान्तम् । लब्ध्वा परमानन्दं न चलति चेतः कदा क्वापि ॥
संसार-ताप से सन्तप्त और नाना योनियों में आने-जाने से श्रान्त (थका) हुआ चित्त परमानन्द को प्राप्त करके फिर कभी चंचल नहीं होता।
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