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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 14 • श्लोक 3
चिरतरमात्मानुभवादात्माकारं प्रजायते चेतः । सरिदिव सागरयाता समुद्रभावं प्रयात्युच्चैः ॥
चिरकाल तक आत्मानुभव करते रहने से चित्त आत्माकार हो जाता है, जिस प्रकार समुद्र को जाने वाली नदी अन्त में पूर्णतया समुद्ररूप ही हो जाती है।
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