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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 14 • श्लोक 5
दृष्टौ द्रष्टरि दृश्ये यदनुस्यूतं च भानमात्रं स्यात् । तत्रोपक्षीणं चेच्चित्तं तन्मूर्छितं भवति ॥
दृष्टि, द्रष्टा और दृश्य में जो ज्ञानमात्र तत्त्व अनुस्यूत हो रहा है उसमें यदि चित्त लीन हो जाय तो वह मूर्छित हो जाता है।
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