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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 14 • श्लोक 6
याति स्वसंमुखत्वं दृङ्मात्रं वा यदा तदा भवति । दृश्यद्रष्टृविभेदो ह्यसंमुखेऽस्मिन्न तद्भवति ॥
जब चित्त आत्माभिमुख रहता है, अथवा यों कहो कि जब वह दृङ्‌मात्र हो जाता है उस समय दृश्य और द्रष्टा का भेद नहीं रहता। किन्तु उसके आत्माभिमुख न रहने पर ऐसा नहीं होता।
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