आत्मन्यनुप्रविष्टं चित्तं नापेक्षते पुनर्विषयान् ।
क्षीरादुद्धृतमाज्यं यथा पुनः क्षीरतां न यातीह ॥
आत्मस्वरूप में लगा हुआ चित्त फिर बाह्य विषयों की इच्छा नहीं करता, जैसे दुग्ध में से निकाला हुआ घी फिर दुग्धभाव को प्राप्त नहीं हो सकता।
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