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अध्याय 13 — नादानुसन्धान

प्रबोधसुधाकर
6 श्लोक • केवल अनुवाद
जब एक क्षण अथवा आधे क्षण के लिये भी स्वरूप का चिन्तन किया जाता है तब सीधे कान में अनाहत-शब्द सुनायी देता है।
नादानुसन्धान मन के लिये सिद्धि के आरम्भ, स्थिरता, विश्राम, विश्वास और वीर्य-शुद्धि का बतलाने वाला परम चिह्न है।
मन तो भेरी, मृदङ्ग और शंख आदि के आघातजन्य नादों में भी एक क्षण के लिये मग्न हो जाता है, फिर इस मधुवत् मधुर, अखण्डित और स्वच्छ अनाहत नाद की तो बात ही क्या है?
विषयों से उपरत होकर मन जैसे-जैसे स्थिर होता जाता है, वैसे-वैसे ही बाँसुरी के शब्द के समान दीर्घ और स्फुट नाद सुनायी पड़ने लगता है।
नाद के भीतर रहने वाली जो ज्योति है, उसमें यदि मन चिरकाल तक लीन हो जाय तो फिर मनुष्य संसार-बन्धन में नहीं पड़ता।
यद्यपि लय के और भी अनेक उपाय हैं तथापि जो चित्तलय दीर्घ काल तक नादानुसन्धान करते हुए परमानन्द का अनुभव होने से प्राप्त होता है वह सर्वोत्तम है।
Krishjan
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