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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 13 • श्लोक 1
यावत्क्षणं क्षणार्धं स्वरूपपरिचिन्तनं क्रियते । तावद्दक्षिणकर्णे त्वनाहतः श्रूयते शब्दः ॥
जब एक क्षण अथवा आधे क्षण के लिये भी स्वरूप का चिन्तन किया जाता है तब सीधे कान में अनाहत-शब्द सुनायी देता है।
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