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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 13 • श्लोक 3
भेरीमृदङ्गशङ्खाद्याहतनादे मनः क्षणं रमते । किं पुनरनाहतेऽस्मिन्मधुमधुरेऽखण्डिते स्वच्छे ॥
मन तो भेरी, मृदङ्ग और शंख आदि के आघातजन्य नादों में भी एक क्षण के लिये मग्न हो जाता है, फिर इस मधुवत् मधुर, अखण्डित और स्वच्छ अनाहत नाद की तो बात ही क्या है?
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