नादाभ्यन्तर्वर्ति ज्योतिर्यद्वर्तते हि चिरम् ।
तत्र मनो लीनं चेन्न पुनः संसारबन्धाय ॥
नाद के भीतर रहने वाली जो ज्योति है, उसमें यदि मन चिरकाल तक लीन हो जाय तो फिर मनुष्य संसार-बन्धन में नहीं पड़ता।
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