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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 13 • श्लोक 4
चित्तं विषयोपरमाद्यथा यथा याति नैश्चल्यम् । वेणोरिव दीर्घतरस्तथा तथा श्रूयते नादः ॥
विषयों से उपरत होकर मन जैसे-जैसे स्थिर होता जाता है, वैसे-वैसे ही बाँसुरी के शब्द के समान दीर्घ और स्फुट नाद सुनायी पड़ने लगता है।
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