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अध्याय 1 — पंचीकरणम

पंचीकरणम
7 श्लोक • केवल अनुवाद
(उस) ब्रह्म से अव्यक्त (अर्थात् सत्व रजः तमः की साम्यावस्था रूप माया प्रकृति प्रधान)। अव्यक्त से महत्। महत् से अहंकार। अहंकार से पांच तन्मात्रायें (शब्दतन्मात्रा १ स्पर्शतन्मात्रा २ रूपतन्मात्रा ३ रसतन्मात्रा ४ गन्धतन्मात्रा ५ अर्थात् सूक्ष्म पंचमहाभूत)। तन्मात्राओं से पांचमहाभूत आकाश १ वायुर तेज ३ जल ४ पृथिवी ५)। महाभूतों से सब संसार (बना)।
पांचों भूतों में से प्रत्येक के दो दो हिस्से करके अपने आधे आधे भाग को छोड़ कर और आधे आधे भाग के चार चार टुकड़े करके दूसरों में से मिला देने पर पञ्चीकरण होता (अर्थात् प्रत्येक भूतों में आधा अपना और आधे में चौथाई चौथाई दूसरे भूत मिलना पञ्श्वीकरण कहाता है, राशि पूरी बनी रहते संमिश्रण हो जाना पञ्चीकरण है)। यह पञ्चीकरण माया रूप दृष्टि गोचर होता है। इस प्रकार अध्यारोप (संघात को दूसरा पदार्थ समझना) अपवाद (संघात को पृथक २ करके मूल तत्व खोजना) से वही प्रपञ्च रहित (ब्रह्म) प्रपञ्चित होता है।
पञ्चीकरण किये हुये पांचो महाभूत और इनका कार्य सब विराट कहा जाता है। यह विराट (संसार) और अपना शरीर स्थूल है। इन्द्रियों से विषयों का साक्षात्कार (शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध आदि का ज्ञान होना) जागरित (जाग्रदवस्था कहाती) है। इन दोनों (स्थूल जागरित) का अभिमानी आत्मा विश्व कहलाता है यह तीनों अर्थात् स्थूल जागरित तथा विश्व (ओंकार का प्रथम अक्षर) अकार (अ कहे जाते हैं)।
जिन पांच भूतों का पञ्चीकरण नहीं हुआ व सूक्ष्मता हुआ है उनको पांच तन्मात्रायें कहते हैं। यह पञ्चतन्मात्रा और उनका कार्य पांचो प्राण दश इन्द्रियां मन तथा बुद्धि यह सत्रह तत्व लिंग (लक्षण मात्र) सूक्ष्म भूतों से बना हुआ (संसार के भीतर भरा हुआ) हिरण्य गर्भ कहलाता है (यह संसार के भीतर और) अपने शरीर के भीतर का शरीर सूक्ष्म है। इन्द्रियों के (बाहिरी विषयों से) उपसंहार हो जाने पर जाग्रदवस्था के संस्कारों से होने वाला प्रपञ्च सब विषयों सहित (अर्थात सोने समय का आन्तरिक प्रपञ्च) स्वप्न कहा जाता है। इन दोनों (सूक्ष्म स्वप्न) का अभिमानी आत्मा तैजस होता है। यह तीनों अर्थात् सूक्ष्म स्वप्न तथा तैजस (ओंकार का दूसरा अक्षर) उकार (उ कहे जाते हैं)।
दोनों (स्थूल-सूक्ष्म) शरीरों का कारण अपने आपका न जानना आभास के सहित अव्याकृत कहा जाता है (यह सब संसार का कारण) और अपने शरीर का कारण, कारण शरीर है (यह) न सत् (है) न असत् (नहीं है)। और न कि ससत् (है नहीं है) कहा जा सकता है। न भिन्न (पृथक २) न अभिन्न (अपृथक २ ) न कि भिन्नाभिन्न (पृथक व मिला हुआ) ही कहा जा सकता है। और ऐसा कहा जाता है कि वह अवयवों (अङ्गों) वाला है व अङ्गों वाला नहीं है व अङ्गसांगता वाला ही है। किन्तु वह केवल ब्रह्म आत्मा के एकत्व ज्ञान से अपनोद्य अर्थात् एक हो जाना परन्तु जानना नहीं कि एक हो गया - ऐसा है। सब प्रकार के ज्ञान के समाप्त होने पर बुद्धि का कारण भाव से ठहर जाना सुषुप्ति है इन दोनों (कारण सुषुप्ति) का अभिमानी आत्मा प्रज्ञ कहाता है। यह तीनों अर्थात् कारण सुषुप्ति तथा प्रज्ञ (ओंकार का तीसरा अक्षर) मकार (म् कहे जाते हैं)।
अ (स्थूल) उ में (सूक्ष्म में) और उ (सूक्ष्म) म (कारण) में लय हो जाता है। तथा म (कारण) ओम् (ब्रह्म) में लय पाता है। ओम् (सगुण ब्रह्म) अहमि (आत्म स्वरूप में) ब्रह्मात्मकत्व ज्ञान साधन में लय हो जाता है। मैं ही आत्मा (आपही आप) द्रष्टुमात्र (देखने वाला ही) केवल चिन्मात्र (ज्ञान स्वरूप) हूँ। न अज्ञान हूँ न अज्ञान का कार्य हूँ। किन्तु सदा रहने वाला निर्मल ज्ञानवान् स्वतन्त्र सत्य स्वभाव श्रेष्ठ सुख स्वरूप हूँ। प्रत्येक प्राणियों का चेतन रूप ब्रह्म ही मैं हूं। इस अभेद से ठहर जाना ज्ञान समाधि कही जाती है
क्योंकि उपनिषद वाक्यों के यह प्रमाण हैं - तत्वमसि = वह तू है। ब्रह्माहमस्मि = वह मैं हूँ। प्रज्ञानमानन्दं ना - जिससे जाना जाता है व सुख स्वरूप मैं हूँ। अयमात्मा ब्रह्म - यह आत्मा (अपना वास्तविक स्वरूप) ब्रह्म है। इत्यादि श्रुतियोंसे जाना गया है। यह पंचीकरण नाम का विचार होता है। ।। इति प्रभीकरण अर्थाद ओम् का अर्थ।।
Krishjan
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