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पंचीकरणम • अध्याय 1 • श्लोक 5
शरीरद्वयकारणमात्माज्ञानं साभासमव्याकृतमि- त्युच्यते । एतत् कारणशरीरमात्मनः । तच्च न सन नासन् नापिसदसत् । न भिन्नं नाभिन्नं नापिभिन्नाभिन्नं कुतश्चित् । न निरवयवं न सावयवं नोभयम् । किन्तु केवल ब्रह्मात्मैकत्त्वज्ञानापनोद्यम् । सर्वप्रकारज्ञानो- पसंहारे बुद्धेः कारणात्मनावस्थानं सुषुप्तिः । तदुभ- याभिमान्यात्मा प्राज्ञ एतत्त्रयं मकारः ॥
दोनों (स्थूल-सूक्ष्म) शरीरों का कारण अपने आपका न जानना आभास के सहित अव्याकृत कहा जाता है (यह सब संसार का कारण) और अपने शरीर का कारण, कारण शरीर है (यह) न सत् (है) न असत् (नहीं है)। और न कि ससत् (है नहीं है) कहा जा सकता है। न भिन्न (पृथक २) न अभिन्न (अपृथक २ ) न कि भिन्नाभिन्न (पृथक व मिला हुआ) ही कहा जा सकता है। और ऐसा कहा जाता है कि वह अवयवों (अङ्गों) वाला है व अङ्गों वाला नहीं है व अङ्गसांगता वाला ही है। किन्तु वह केवल ब्रह्म आत्मा के एकत्व ज्ञान से अपनोद्य अर्थात् एक हो जाना परन्तु जानना नहीं कि एक हो गया - ऐसा है। सब प्रकार के ज्ञान के समाप्त होने पर बुद्धि का कारण भाव से ठहर जाना सुषुप्ति है इन दोनों (कारण सुषुप्ति) का अभिमानी आत्मा प्रज्ञ कहाता है। यह तीनों अर्थात् कारण सुषुप्ति तथा प्रज्ञ (ओंकार का तीसरा अक्षर) मकार (म् कहे जाते हैं)।
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