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पंचीकरणम • अध्याय 1 • श्लोक 6
अकार उकारे । उकारो मकारे । मकार ओङ्कारे । ओङ्कारोहम्येव अहमेवात्मा साक्षीकेवलश्चिन्मात्रस्व- रूपो ना ज्ञानं नापि तत्कार्यम् । किन्तु नित्य शुद्ध बुद्धमुक्त सत्यस्वभावं परमानन्दाद्वयं प्रत्यग्भूत- चैतन्यं ब्रह्मैवाहमस्मीत्यभेदेनावस्थानं समाधिः ॥
अ (स्थूल) उ में (सूक्ष्म में) और उ (सूक्ष्म) म (कारण) में लय हो जाता है। तथा म (कारण) ओम् (ब्रह्म) में लय पाता है। ओम् (सगुण ब्रह्म) अहमि (आत्म स्वरूप में) ब्रह्मात्मकत्व ज्ञान साधन में लय हो जाता है। मैं ही आत्मा (आपही आप) द्रष्टुमात्र (देखने वाला ही) केवल चिन्मात्र (ज्ञान स्वरूप) हूँ। न अज्ञान हूँ न अज्ञान का कार्य हूँ। किन्तु सदा रहने वाला निर्मल ज्ञानवान् स्वतन्त्र सत्य स्वभाव श्रेष्ठ सुख स्वरूप हूँ। प्रत्येक प्राणियों का चेतन रूप ब्रह्म ही मैं हूं। इस अभेद से ठहर जाना ज्ञान समाधि कही जाती है
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