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पंचीकरणम • अध्याय 1 • श्लोक 4
अपचीकृतपश्चमहाभूतानि तत्कार्यं च पंचप्राणा दशेन्द्रियाणि पञ्चतन्मात्राणि मनोबुद्धिश्चेति सप्तदशकं लिंगंभौतिकं हिरण्यगर्भ इत्युच्यते एत- त्सूक्ष्मशरीरमात्मनः । करणेषूपसंहतेषु जागरित संस्कारजः प्रत्ययःसविषयः स्वप्न इत्युच्यते । तदुभया- भिमान्यात्मा तैजस एतत्त्रयमुकारः ॥
जिन पांच भूतों का पञ्चीकरण नहीं हुआ व सूक्ष्मता हुआ है उनको पांच तन्मात्रायें कहते हैं। यह पञ्चतन्मात्रा और उनका कार्य पांचो प्राण दश इन्द्रियां मन तथा बुद्धि यह सत्रह तत्व लिंग (लक्षण मात्र) सूक्ष्म भूतों से बना हुआ (संसार के भीतर भरा हुआ) हिरण्य गर्भ कहलाता है (यह संसार के भीतर और) अपने शरीर के भीतर का शरीर सूक्ष्म है। इन्द्रियों के (बाहिरी विषयों से) उपसंहार हो जाने पर जाग्रदवस्था के संस्कारों से होने वाला प्रपञ्च सब विषयों सहित (अर्थात सोने समय का आन्तरिक प्रपञ्च) स्वप्न कहा जाता है। इन दोनों (सूक्ष्म स्वप्न) का अभिमानी आत्मा तैजस होता है। यह तीनों अर्थात् सूक्ष्म स्वप्न तथा तैजस (ओंकार का दूसरा अक्षर) उकार (उ कहे जाते हैं)।
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