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अध्याय 1 — नासदीय सूक्त
नासदीय सूक्त
7 श्लोक • केवल अनुवाद
उस समय (प्रलयकाल में) (मूलकारण) असत् (नामरूपादिरहित अवस्था) नहीं था (और) न ही सत् (नामरूपात्मक अवस्था) था, न (कोई) लोक (था) (ओर) न ही आकाशं (था) जो ऊपर (घुलोक इत्यादि है वह भी नहीं था) कहाँ (और) किसकी सुरक्षा में किसने चारो ओर से आवृत्त किया था। क्या (उस समय) अपार गहरा जल था?
(उस समय) मृत्यु नही थी, न अमृतत्व (था), रात्रि (और) दिन का चिह्न (भेदात्मक ज्ञान भी) नहीं था। वह एक (अकेला) वायु के बिना अपनी इच्छाशक्ति से श्वास ले रहा था। उससे बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं था।
(सृष्टि से) पहले अन्धकार से आच्छादित (ढका हुआ) अन्धकार था। यह सम्पूर्णं (विश्च का कारण भूत) चिन्हरहित (भेदात्मकज्ञान-रहित) जल था। (इससे भित्र कोई चिह्न नहीं था) जो (भावरूप) अज्ञान से आवृत सर्वव्यापी था। वह एक (अद्वित्य) (अपनी) तपस्या की महिमा से उत्पन्न हुआ।
सर्वप्रथम काम, जो मन का प्रथम विकार था, वह उत्पन्न हुआ। प्रज्ञावान् (क्रान्तद्रष्टा) लोगों ने हृदय (अन्तःकरण) में प्रज्ञा द्वारा विचार करके असत (नामरहित तत्त्व) मे सत् (नामरूपात्मकजगत्) के (मूलकारणरूप) सम्बन्ध को जाना ।
उनकी फैली हुई (कार्यजलरूपी) किरण मध्य में अथवा नीचे थी अथवा ऊपर थी (यह कौन जानता है)। सृष्टि का का बीज धारण करने वाले (आकाशादि) महाभूत थे। स्वधा (अन्न अथवा भोग्य प्रपञ्च) नीचे और भोक्ता ऊपर था ।
कौन (सृष्टि के विषय में) यथार्थरूप से जानता है (कोई नहीं जानता), कौन इस (सृष्टि) के विषय में कहेगा कि कहाँ से, यह विविधरूपा सृष्टि कहाँ से उत्पन्न हुई । देवता इस (सृष्टि) की रचना से अर्वाचीन (परवर्ती) हैं, फिर जहाँ से (यह) उत्पन्न हुई है, (इसे) कौन जानता है (अर्थात् कोई नहीं जानता)।
यह विविधरूपा सृष्टि जहाँ से उत्पन्न हुई (आयी) है, (उसको उसने) या तो धारण किया था अथवा यदि नहीं (धारण किया था) (तो किसने धारण किया था) । जो इसका स्वामी है, वह ऊंचे स्वर्गलोक में (है); निश्चित रूप से (वह इसको) जानता है अथवा यदि (वह) नहीं जानता है (तो कौन जानता है)।
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