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नासदीय सूक्त • अध्याय 1 • श्लोक 4
काम॒स्तदग्रे॒ सम॑वर्त॒ताधि॒ मन॑सो॒ रेतः॑ प्रथ॒मं यदासी॑त् । स॒तो बन्धु॒मस॑ति॒ निर॑विन्दन्हृ॒दि प्र॒तीष्या॑ क॒वयो॑ मनी॒षा ॥
सर्वप्रथम काम, जो मन का प्रथम विकार था, वह उत्पन्न हुआ। प्रज्ञावान्‌ (क्रान्तद्रष्टा) लोगों ने हृदय (अन्तःकरण) में प्रज्ञा द्वारा विचार करके असत (नामरहित तत्त्व) मे सत्‌ (नामरूपात्मकजगत्‌) के (मूलकारणरूप) सम्बन्ध को जाना ।
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