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नासदीय सूक्त • अध्याय 1 • श्लोक 6
को अ॒द्धा वे॑द॒ क इ॒ह प्र वो॑च॒त्कुत॒ आजा॑ता॒ कुत॑ इ॒यं विसृ॑ष्टिः । अ॒र्वाग्दे॒वा अ॒स्य वि॒सर्ज॑ने॒नाथा॒ को वे॑द॒ यत॑ आब॒भूव॑ ॥
कौन (सृष्टि के विषय में) यथार्थरूप से जानता है (कोई नहीं जानता), कौन इस (सृष्टि) के विषय में कहेगा कि कहाँ से, यह विविधरूपा सृष्टि कहाँ से उत्पन्न हुई । देवता इस (सृष्टि) की रचना से अर्वाचीन (परवर्ती) हैं, फिर जहाँ से (यह) उत्पन्न हुई है, (इसे) कौन जानता है (अर्थात्‌ कोई नहीं जानता)।
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