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नासदीय सूक्त • अध्याय 1 • श्लोक 5
ति॒र॒श्चीनो॒ वित॑तो र॒श्मिरे॑षाम॒धः स्वि॑दा॒सी३दु॒परि॑ स्विदासी३त् । रे॒तो॒धा आ॑सन्महि॒मान॑ आसन्स्व॒धा अ॒वस्ता॒त्प्रय॑तिः प॒रस्ता॑त् ॥
उनकी फैली हुई (कार्यजलरूपी) किरण मध्य में अथवा नीचे थी अथवा ऊपर थी (यह कौन जानता है)। सृष्टि का का बीज धारण करने वाले (आकाशादि) महाभूत थे। स्वधा (अन्न अथवा भोग्य प्रपञ्च) नीचे और भोक्ता ऊपर था ।
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