न मृ॒त्युरा॑सीद॒मृतं॒ न तर्हि॒ न रात्र्या॒ अह्न॑ आसीत्प्रके॒तः ।
आनी॑दवा॒तं स्व॒धया॒ तदेकं॒ तस्मा॑द्धा॒न्यन्न प॒रः किं च॒नास॑ ॥
(उस समय) मृत्यु नही थी, न अमृतत्व (था), रात्रि (और) दिन का चिह्न (भेदात्मक ज्ञान भी) नहीं था। वह एक (अकेला) वायु के बिना अपनी इच्छाशक्ति से श्वास ले रहा था। उससे बढ़कर दूसरा कुछ भी नहीं था।
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