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अध्याय 2 — द्वितीय प्रपाठक
मैत्रायण्य
11 श्लोक • केवल अनुवाद
तत्पशात् यह
(राजा बृहद्रथ की गाथा को)
सुनकर
श्रेष्ठ मुनि शाकायन्य
ने अति प्रसन्न होकर कहा: हे
महाराज बृहद्रथ
! तुम
इक्ष्वाकु वंश
में उत्पन्न नरेश
ध्यजशीर्ष
के पुत्र हो। तुम सभी तरह से कृतकृत्य होते हुए
‘मरुत्’
के नाम से प्रख्यात हो। यह
आत्मा
क्या एवं कैसा है? मैं अब तुम्हें इसके
सारतत्त्व
को बताने का प्रयास करता हूँ।
राजा बृहद्रथ
ने कहा: हे
श्रेष्ठ मुने
! आप मुझे तत्सम्बन्धित विषय के सन्दर्भ में अवश्य ही बताने की कृपा करें।
तदनन्तर
महर्षि
कहने लगे: हे राजन्!
बाह्य इन्द्रियों
का निरोध करने से
(उन्हें अन्तर्मुखी बनाने से)
प्राणतत्त्व रूपी यह आत्मा
योग के माध्यम से ऊर्ध्व की ओर गमन करता है। वह दुःख रूप प्रतिभासित होते हुए भी वास्तव में
दु:खरहित
है तथा
अज्ञानरूप अन्धकार
को विनष्ट करने में समर्थ है। यही
आत्मा
इस
नश्वर शरीर
से बहिर्गमन करने पर
परम ज्योतिस्वरूप परमात्मतत्त्व
को वरण करके स्वयमेव अपने स्वरूप में विलीन हो जाता है। यह आत्मतत्त्व
अमृतयुक्त
,
भयरहित
तथा स्वयं ही
ब्रह्मरूप
है।
हे राजन्! जिस
(अविनाशी ब्रह्मविद्या)
का सभी
उपनिषदें
एक स्वर से उपदेश करती हैं, उस
ब्रह्मविद्या
के ज्ञान को
भगवान् मैत्रेय
ने मुझे बताया है, वही
श्रेष्ठ ज्ञान
मैं तुम्हें बतलाता हूँ। साधना द्वारा जिसके समस्त
पाप
नष्ट हो गये हैं, ऐसे
तेजस्वी
एवं
ब्रह्मचर्य व्रत
को धारण करने वाले
मुनि वालखिल्य
के नाम से जाने जाते हैं। ऐसा ही एक बार उन
श्रेष्ठ मुनि
ने
ब्रह्मा
जी से प्रश्न किया: हे ब्रह्मन्! यह
शरीर
गाड़ी की भाँति अचेतन है, तो फिर ऐसा कौन सा
अतीन्द्रिय तत्त्व
है, किस
श्रेष्ठ तत्त्व
की ऐसी महिमा है? जिससे कि यह शरीर
चैतन्य
की भाँति प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। इस शरीर को जो प्रेरित करता है, उसे
वाणी से भी परे
(श्रेष्ठ)
बताया गया है। हे
भगवन्
! उसी
(श्रेष्ठ तत्व)
को हमारे समक्ष बताने की कृपा करें।
(ब्रह्मा जी ने मुनि से कहा—)
उस श्रेष्ठ तत्त्व को
शुद्ध
,
पवित्र
,
शून्य
,
शान्त
,
जीवन प्रदान करने वाला
,
अनन्त
,
अविनाशी
,
शाश्वत
,
सनातन
,
स्थिर
,
अजन्मा
एवं
स्वतन्त्र रूप
से निवास करने वाला
आत्मा
कहा जाता है। उसी की ही यह
महान् महिमा
है। उस
आत्मा
से ही इस
अचेतन शरीर
को चेतन की भाँति प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। वही चेतन
आत्म तत्त्व
प्रेरणा प्रदान करने वाला है। यह सुनने के बाद
महामुनि वालखिल्य
जी ने पुनः प्रश्न किया: हे
भगवन्
! यह
आत्मा
अनिच्छित होते हुए भी
चैतन्यरूप
से इस शरीर में कैसे स्थिर है? इस शरीर को यह प्रेरित क्यों करता है? तथा इस आत्मा को यह
महिमा
किस प्रकार की है?
ब्रह्मा जी
ने कहा:
(हे मुने!)
यह आत्मा
सूक्ष्म
,
अग्राह्य
और
अदृश्य रूप
है, इस कारण इसे
‘पुरुष’
नाम की संज्ञा द्वारा जाना जाता है। यह आत्मा अपने एक अंश से इस शरीर में अपने प्रयोजन के अभाव में भी बुद्धिपूर्वक सतत आता रहता है। सोते हुए को वह युक्तिपूर्वक बोध कराते हुए
चैतन्य
रूप से सभी प्राणियों में प्रतिष्ठित करता है। वही प्रत्येक शरीर में
क्षेत्र
के रूप में प्रतिष्ठित है; वही
प्रकाश
,
संकल्प
,
प्रयास
,
अहंकार
,
लिंग
(पुरुष-स्त्री आदि)
और
प्रजापति
के रूप में समस्त विश्व को देखने वाला है। उसी को चेतना से शरीर चैतन्ययुक्त है। वही इस शरीर को क्रियान्वयन हेतु प्रेरित करता है।
वालखिल्य
ने पुनः प्रश्न किया: हे
भगवन्
! यह
आत्मा अखण्ड
होने पर भी किस तरह
अंश रूप
में यहाँ स्थिर है?
ब्रह्मा जी
ने कहा— प्रारम्भ में केवल
प्रजापति
ही विद्यमान थे। वे अकेले थे, अतः उन्हें
अरति
(असंतोष अथवा एकाकीपन)
का अनुभव हुआ। तब उन्होंने अपने ही स्वरूप का ध्यान किया और उससे उन्होंने अनेक
प्रजाओं
की सृष्टि की। किन्तु वे समस्त प्राणी, यद्यपि उनके ही स्वरूप से उत्पन्न हुए थे, फिर भी
चेतनाहीन
और
प्राणरहित
होकर मानो स्थिर खम्भों के समान खड़े रहे। यह देखकर
प्रजापति
पुनः अप्रसन्न हुए और उन्होंने विचार किया — "इन प्राणियों को चेतना प्रदान करने के लिए मुझे इनके भीतर प्रवेश करना चाहिए।" तब उन्होंने स्वयं को
वायु
के समान सूक्ष्म बनाकर उन प्राणियों के भीतर प्रवेश किया। उन्होंने एक होकर प्रवेश किया, किन्तु भीतर प्रवेश करने पर स्वयं को
पाँच भागों
में विभाजित कर लिया। इन्हीं को
प्राण
,
अपान
,
समान
,
उदान
और
व्यान
कहा जाता है।
इनमें जो
ऊर्ध्व दिशा
में गमन करता है, वही वास्तव में
प्राण
कहलाता है। और जो
अधोमुख
होकर संचरण करता है, वही
अपान
है। जो स्थूल
अन्नरस
को
अपान
में स्थापित करता है और सूक्ष्म अंश को शरीर के प्रत्येक
अंग
में समान रूप से पहुँचाता है, वही
समान
है। जो खाए और पिए हुए पदार्थों को ऊपर उठाता, निगलता और उनका निष्कासन करता है, वही
उदान
है। और जिसके द्वारा ये समस्त
नाड़ियाँ
व्याप्त हैं, वही
व्यान
कहलाता है।
उपांशु
और
अन्तर्याम
नामक प्राणशक्तियों के मध्य जो
ऊष्मा
विद्यमान है, वही शरीर में व्याप्त
ताप
और जीवनशक्ति का कारण है। यही
ऊष्ण तत्त्व
वास्तव में
पुरुष
है, और वही
वैश्वानर अग्नि
कहलाता है। अन्य स्थानों पर भी कहा गया है कि — "
यह वैश्वानर अग्नि
ही वह पुरुष है, जिसके द्वारा यह खाया हुआ
अन्न
पचाया जाता है।" इस
वैश्वानर अग्नि
का एक विशेष
नाद
(सूक्ष्म ध्वनि)
होता है, जिसे मनुष्य अपने
कानों
को बंद करके सुन सकता है। किन्तु जब जीव
शरीर का त्याग
करने वाला होता है, तब वह इस
नाद
को नहीं सुन पाता।
वह
परमात्मा
, जिसने स्वयं को
पाँच प्रकार
से विभाजित किया है,
हृदय-गुहा
में स्थित रहता है। वह
मनोमय
,
प्राणशरीरयुक्त
,
बहुरूप
तथा
सत्यसंकल्प
स्वरूप
आत्मा
है। हृदय में स्थित रहते हुए उसने विचार किया — "मैं इन विषयों का अनुभव करूँ।" तब उसने अपने इन
आवरणों
को भेदकर
पाँच किरणों
के द्वारा बाहर की ओर गमन किया। ये
बुद्धि
और
ज्ञानेन्द्रियाँ
ही उसकी वे
किरणें
हैं, जिनके द्वारा वह विषयों का अनुभव करता है। और
कर्मेन्द्रियाँ
उसके
घोड़ों
के समान हैं; यह
शरीर
उसका
रथ
है, तथा
मन
उसका
नियन्ता
है। यह समस्त व्यवस्था
प्रकृति
से निर्मित है, और उसी के प्रेरक
प्रतोद
(चाबुक)
से प्रेरित होकर यह
शरीररूपी रथ
चक्र की भाँति निरन्तर घूमता रहता है। जब यह
चेतन प्रेरक आत्मा
इससे अलग हो जाता है, तब यह
शरीर
चेतनाशून्य होकर स्थिर पड़ जाता है; क्योंकि वास्तव में इसी
आत्मा
के द्वारा यह शरीर प्रेरित और संचालित होता है।
वही यह
आत्मा
है, जो मानो
शुभ
और
अशुभ कर्मों
के फलों के अधीन होकर विभिन्न
शरीरों
में विचरण करता हुआ प्रतीत होता है। किन्तु वास्तव में, अपनी
अव्यक्तता
,
सूक्ष्मता
,
अदृश्यता
,
अग्राह्यता
और
निर्ममत्व
के कारण, वह किसी एक स्थान में बँधा हुआ नहीं है। वह वस्तुतः
अकर्ता
है, तथापि
कर्ता
के समान व्यवहार करता हुआ प्रतीत होता है।
वही यह
आत्मा
वास्तव में
शुद्ध
,
स्थिर
,
अचल
,
निर्लेप
,
अव्यग्र
और
निःस्पृह
है। वह
द्रष्टा
(साक्षी)
के समान स्थित रहता है और केवल अपने ही
चरित
(कर्मों के फल)
का अनुभव करता हुआ प्रतीत होता है। वह
गुणमयी माया
के आवरणरूपी
पट
से अपने वास्तविक स्वरूप को आच्छादित करके स्थित रहता है। इस प्रकार वह वास्तव में सदैव अपने स्वरूप में ही
स्थित
रहता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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