प्रजापतिर्वा एषोऽग्रेऽतिष्ठत्स नारमतैकः स आत्मानमभिध्यायद्बह्वी प्रजा असृजत्ता अस्यैवात्मप्रबुद्धा अप्राणा स्थाणुरिव तिष्ठमाना अपश्यत्स नारमत सोऽमन्यतैतासां प्रतिबोधनायाभ्यन्तरं प्राविशानीत्यथ स वायुमिवात्मानं कृत्वाभ्यन्तरं प्राविशत्स एको नाविशत्स पञ्चधात्मानं प्रविभज्योच्यते यः प्राणोऽपानः समान उदानो व्यान इति॥
ब्रह्मा जी ने कहा—
प्रारम्भ में केवल प्रजापति ही विद्यमान थे। वे अकेले थे, अतः उन्हें अरति(असंतोष अथवा एकाकीपन) का अनुभव हुआ।
तब उन्होंने अपने ही स्वरूप का ध्यान किया और उससे उन्होंने अनेक प्रजाओं की सृष्टि की।
किन्तु वे समस्त प्राणी, यद्यपि उनके ही स्वरूप से उत्पन्न हुए थे, फिर भी चेतनाहीन और प्राणरहित होकर मानो स्थिर खम्भों के समान खड़े रहे।
यह देखकर प्रजापति पुनः अप्रसन्न हुए और उन्होंने विचार किया — "इन प्राणियों को चेतना प्रदान करने के लिए मुझे इनके भीतर प्रवेश करना चाहिए।"
तब उन्होंने स्वयं को वायु के समान सूक्ष्म बनाकर उन प्राणियों के भीतर प्रवेश किया।
उन्होंने एक होकर प्रवेश किया, किन्तु भीतर प्रवेश करने पर स्वयं को पाँच भागों में विभाजित कर लिया।
इन्हीं को प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान कहा जाता है।
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