स वा एष शुद्धः स्थिरोऽचल श्चालेपोऽव्यग्रो नि:स्पृहः प्रेक्षकवदवस्थितः स्वस्य चरितभुग्गुणमयेन पटेनात्मानमन्तर्धायावस्थित इत्यवस्थित इति ।।
वही यह आत्मा वास्तव में शुद्ध, स्थिर, अचल, निर्लेप, अव्यग्र और निःस्पृह है।
वह द्रष्टा(साक्षी) के समान स्थित रहता है और केवल अपने ही चरित(कर्मों के फल) का अनुभव करता हुआ प्रतीत होता है।
वह गुणमयी माया के आवरणरूपी पट से अपने वास्तविक स्वरूप को आच्छादित करके स्थित रहता है।
इस प्रकार वह वास्तव में सदैव अपने स्वरूप में ही स्थित रहता है।
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