उपांशु और अन्तर्याम नामक प्राणशक्तियों के मध्य जो ऊष्मा विद्यमान है, वही शरीर में व्याप्त ताप और जीवनशक्ति का कारण है।
यही ऊष्ण तत्त्व वास्तव में पुरुष है, और वही वैश्वानर अग्नि कहलाता है।
अन्य स्थानों पर भी कहा गया है कि — "यह वैश्वानर अग्नि ही वह पुरुष है, जिसके द्वारा यह खाया हुआ अन्न पचाया जाता है।"
इस वैश्वानर अग्नि का एक विशेष नाद(सूक्ष्म ध्वनि) होता है, जिसे मनुष्य अपने कानों को बंद करके सुन सकता है।
किन्तु जब जीव शरीर का त्याग करने वाला होता है, तब वह इस नाद को नहीं सुन पाता।
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