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अध्याय 65 — अथ छागलक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
11 श्लोक • केवल अनुवाद
अब बकरे का शुभाशुभ लक्षण कहते हैं। नव, दश या आठ दाँत वाले छाग शुभ होते हैं; अतः उनको घर में रखने से शुभ होता है तथा सात दाँत वाले छाग अशुभ होते हैं: अत: उनका बहिष्कार करना चाहिये ।
जिस छाग के दक्षिण पार्क में बेत वर्ण का मण्डल हो, ऋष्य (मृगविशेष) के समान कृष्ण-लोहित वर्ण हो या काले अथवा लाल वर्ण के होते हुये भी जिसके दक्षिण पार्क में खेत वर्ण का मण्डल हो, वह शुभ होता है।
छागों के गले में स्तन की तरह जो लटका रहता है, उसको 'मणि' कहते हैं। एक मणि वाले शुभ और दो या तीन मणि वाले छाग अत्यन्त शुभ होते हैं।
विना सींग वाले, सम्पूर्ण कृष्ण या चेत शरीर वाले, आधे काले और आधे क्षेत वर्ण वाले, आधे पीले और आधे काले रंग वाले ये सभी छाग शुभ होते हैं।
अपने यूथ के आगे चलने वाला, सबसे पहले पानी में घुसने वाला, चेत वर्ण के शिर वाला या कृत्तिका नक्षत्र की तरह छः बिन्दुओं से युक्त मस्तक वाला छाग शुभ होता है। ऐसे छाग को 'कुट्टक' कहते हैं।
गले और मस्तक पर भित्र वर्ण के बिन्दु वाले, तिलपिष्ट के समान चेत-पीत वर्ण वाले, ताम्र के समान लाल नेत्र वाले, खेत शरीर और काले पाँव वाले या काले शरीर और खेत पाँव वाले छाग शुभ होते हैं। ऐसे छाग को 'कुटिल' कहते हैं।
जिसका काला अण्डकोश हो, श्वेत वर्ण हो, मध्य भाग में काला पट्टा हो, जो चुगने के समय शब्द करता हो या धीरे-धीरे चुगता हो-ऐसा सब छाग शुभ होता है। ऐसे हाग को 'जटिल' कहते हैं।
जिसके ऋष्य (काला मृए) के समान शिर के बाल और पाँव हों या अगले भाग में पाण्डुर वर्ण और पिछले भाग में नीला वर्ण हो, वह छाग शुभ होता है। इस छाग को 'वामन' कहते हैं। इसी प्रकार से गर्ग मुनि ने भी वामनसंज्ञक छाग का लक्षण स्वप्रणीत श्लोक में बतलाया है।
कुट्टक, कुटिल, जटिल और वामन-ये चारो प्रकार के छाग लक्ष्मी के पुत्र हैं और लक्ष्मीरहित देश में ये सभी निवास नहीं करते हैं।
गदहे के समान शब्द करने वाले, गर्म या टेड़ी पूँछ वाले, खराब नख वाले, खराब वर्ण वाले, फटे कान वाले, हाथी के समान मस्तक वाले तथा काली तालु और जीभ वाले छाग अशुभ होते हैं।
उत्तम वर्ण वाले, मणियों से युत गले वाले, विना सींग वाले और लाल आँख काले छाग जिनके घर में रहते हैं, उनके सुख, यश और लक्ष्मी को बढ़ाते हैं।
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